भोपाल। स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि दर्ज करते हुए नोबल मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल, भोपाल में उन्नत रियोलिटिक थ्रोम्बेक्टॉमी (Rheolytic Thrombectomy) तकनीक की शुरुआत की गई है। अस्पताल प्रबंधन के अनुसार यह सुविधा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपनी तरह की पहली 24×7 उपलब्ध उन्नत तकनीक है, जो जटिल रक्त के थक्कों (ब्लड क्लॉट) के उपचार में नई उम्मीद लेकर आई है।
शनिवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में चीफ इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट डॉ. अगम्य सक्सेना (MD, EBIR) और डायरेक्टर एवं क्रिटिकल केयर एक्सपर्ट डॉ. सर्वेश मिश्रा (MBBS, MD) ने बताया कि यह तकनीक फार्मोको-मैकेनिकल (Pharmacomechanical) प्रणाली पर आधारित है। इसमें दवा और मैकेनिकल प्रक्रिया के संयोजन से थक्के को तोड़ा और हटाया जाता है, जिससे प्रभावित हिस्से में रक्त प्रवाह तेजी से बहाल होता है।
डॉ. सक्सेना ने बताया कि इस प्रक्रिया में बड़े चीरे या बेहोशी की आवश्यकता नहीं होती। केवल एक छोटी सुई के माध्यम से धमनी के रास्ते प्रभावित स्थान तक पहुंचकर थक्का हटाया जाता है। यह तकनीक हाथ, पैर, पेट, डायलिसिस फिस्टुला और अन्य रक्त वाहिकाओं में बने जटिल थक्कों के इलाज में प्रभावी है।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि नई स्ट्रोक गाइडलाइंस 2026 के अनुसार त्वरित थ्रोम्बेक्टॉमी आधारित उपचार को प्राथमिकता दी जा रही है। समय पर हस्तक्षेप से लकवे (पैरालिसिस) और अंग कटने जैसी गंभीर जटिलताओं का जोखिम काफी कम किया जा सकता है।
उन्होंने नागरिकों से अपील की कि यदि अचानक हाथ या पैर में कमजोरी, सूजन, तेज दर्द, त्वचा का रंग बदलना, बोलने में कठिनाई या शरीर के किसी हिस्से में सुन्नता जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट से संपर्क करें।
अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, डॉ. अगम्य सक्सेना अब तक इस तकनीक से 125 से अधिक जटिल थ्रोम्बेक्टॉमी सफलतापूर्वक कर चुके हैं। पहले यह उपकरण किराये पर मंगवाया जाता था, जिससे समय निर्धारण में व्यावहारिक कठिनाइयाँ आती थीं। अब उपकरण की स्थायी उपलब्धता के साथ यह सुविधा 24×7 प्रदान की जा सकेगी।
प्रेसवार्ता में मौजूद मरीज आकाश (परिवर्तित नाम) ने भावुक होते हुए बताया कि कैसे उनके पैर में जमे थक्के की वजह से स्थिति गंभीर हो गई थी, लेकिन नोबल अस्पताल के डॉक्टरों ने इस आधुनिक तकनीक से बिना किसी बड़े ऑपरेशन के उनका पैर कटने से बचा लिया ।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस उन्नत सुविधा के शुरू होने से मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मरीजों को खून की नसों के जटिल उपचार के लिए महानगरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इससे समय, लागत और जोखिम—तीनों में कमी आएगी।
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