धर्म/आस्था

पितरों और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का पक्ष, जानिए तर्पण का धार्मिक महत्व

भोपाल। भाद्रपद की पूर्णिमा तिथि के साथ पितृपक्ष आरंभ हो गए है जो अश्विन मास की अमावस्या तिथि के साथ समाप्त होंगे। हिंदू धर्म में पितृपक्ष का काफी अधिक महत्व है। जिस तरह से देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। उसी तरह पितृपक्ष में पितरों की पूजा की जाती हैं, जिससे वह प्रसन्न हो अपने परिवार के लोगों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

आचार्य कमलेश जोशी के अनुसार पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण करने से पितर प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। उनकी कृपा से जीवन में आने वाली कई प्रकार की रुकावटें दूर होती हैं। व्यक्ति को कई तरह की दिक्कतों से भी मुक्ति मिलती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, पितृ पक्ष 29 सितंबर यानी आज से शुरू हो चुके हैं।

वर्ष में पंद्रह दिन की विशेष अवधि में श्राद्ध कर्म

श्राद्ध के दौरान कुल देवताओं, पितरों और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट की जाती है। वर्ष में पंद्रह दिन की विशेष अवधि में श्राद्ध कर्म किए जाते हैं और इसकी शुरुआत आज से हो चुकी है। श्राद्ध पक्ष को पितृपक्ष और महालय के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज पृथ्वी पर सूक्ष्म रूप में आते हैं और उनके नाम से किए जाने वाले तर्पण को स्वीकार करते हैं। इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और घर में सुख-शांति बनी रहती है।

पिंडदान करने से पितरों को मिलेगा मोक्ष

मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पितरों का पिंडदान करने से उन्हें पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। इतना ही नहीं कुंडली से पितृ दोष से भी मुक्ति मिल जाती है।

अनुष्ठानों का विशेष समय

पितृ पक्ष का कुतुप मुहूर्त 29 सितंबर यानी आज दोपहर 11 बजकर 47 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगा। साथ ही रौहिण मुहूर्त आज दोपहर 12 बजकर 35 मिनट से दोपहर 1 बजकर 23 मिनट तक रहेगा। अपराह्न काल आज दोपहर 1 बजकर 23 मिनट से लेकर दोपहर 3 बजकर 46 मिनट तक रहेगा।

पितृ पक्ष में कैसे करें पितरों को याद

पितृ पक्ष में हम अपने पितरों को नियमित रूप से जल अर्पित करें। यह जल दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके दोपहर के समय दिया जाता है। जल में काला तिल मिलाया जाता है और हाथ में कुश रखा जाता है। जिस दिन पूर्वज की देहांत की तिथि होती है, उस दिन अन्न और वस्त्र का दान किया जाता है। उसी दिन किसी निर्धन को भोजन भी कराया जाता है। इसके बाद पितृपक्ष के कार्य समाप्त हो जाते हैं।

पितृ पक्ष तर्पण विधि

प्रतिदिन सूर्योदय से पहले एक जूड़ी ले लें, और दक्षिणी मुखी होकर वह जूड़ी पीपल के वृक्ष के नीचे स्थापित करके, एक लोटे में थोड़ा गंगा जल, बाकी सादा जल भरकर लौटे में थोड़ा दूध, बूरा, काले तिल, जौ डालकर एक चम्मच से कुशा की जूडी पर 108 बार जल चढ़ाते रहें और प्रत्येक चम्मच जल पर यह मंत्र उच्चारण करते रहे।

पितृ को प्रसन्न करने के लिए करें ये काम

पितृ पक्ष में अगर कोई जानवर या पक्षी आपके घर आए, तो उसे भोजन जरूर कराना चाहिए। मान्‍यता है कि पूर्वज इन रूप में आपसे मिलने आते हैं। पितृ पक्ष में पत्तल पर भोजन करें और ब्राह्राणों को भी पत्तल में भोजन कराएं, तो यह फलदायी होता है।

इन कार्यों से नाराज होते हैं पितर

श्राद्ध कर्म करने वाले सदस्य को इन दिनों बाल और नाखून नहीं काटने चाहिए. उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन भी करना चाहिए. श्राद्ध कर्म हमेशा दिन में करें. सूर्यास्‍त के बाद श्राद्ध करना अशुभ माना जाता है. इन दिनों में लौकी, खीरा, चना, जीरा और सरसों का साग नहीं खाना चाहिए. जानवरों या पक्षी को सताना या परेशान भी नहीं करना है

विशेष स्थान पर श्राद्ध कर्म, विशेष फल

यदि किसी विशेष स्थान पर श्राद्ध कर्म किया जाता है तो यह विशेष फल देता है। कहा जाता है कि गया, प्रयाग, बद्रीनाथ में श्राद्ध करने से पितरों को मोक्ष मिलता है। जो किसी भी कारण से इन पवित्र तीर्थों पर श्राद्ध कर्म नहीं कर सकते हैं वे अपने घर के आंगन में किसी भी पवित्र स्थान पर तर्पण और पिंड दान कर सकते हैं।

-श्राद्ध कर्म के लिए काले तिल का उपयोग करना चाहिए।  पिंडदान करते वक्त तुलसी जरूर रखें।

-पितृ पक्ष में, गायों, कुत्तों, चींटियों और ब्राह्मणों को यथासंभव भोजन कराना चाहिए।

इस प्रकार विधि विधान से श्राद्ध पूजा कर जातक पितृ ऋण से मुक्ति पा लेता है व श्राद्ध पक्ष में किये गये उनके श्राद्ध से पितर प्रसन्न होते हैं व आपके घर परिवार व जीवन में सुख, समृद्धि होने का आशीर्वाद देते हैं।

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