भोपाल। प्रतिबंध के बाद भी मप्र में आयातित डॉमर खपाई जा रही है। सरकारी नियमों को ताक में रख चलाए जा रहे इस गोरखधंधे से सरकार को करोड़ोंं रूपये सालाना का राजस्व नुकसान है। खास बात यह है कि सड़कनिर्माण से जुड़े इस मामले में निजी टेडर्स से लेकर लोक निर्माण विभाग के जिम्मेदार तक शामिल है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!दरअसल मप्र में सड़क निर्माण में लगने वाला डामर केवल सरकारी रिफायनरियों से लेने का नियम है। इसकी पुष्टि के लिये लोक निर्माण विभाग को ठेकेदार डामर का बिल जमा कराता है। बावजूद इसके विभागीय अधिकारियों के साथ ठेकेदारों और कंपनियों का गठजोड़ आयातित डामर के उपयोग को जहां बढ़ावा दे रहा है। वहीं सरकारी रिफायनरियों का फर्जी बिल जमा कर सरकार को करोड़ो रूपए की चपत लगाई जा रही है। लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों का पक्ष इस मामले में सामने नहीं आ पाया है।
जानकारी के अनुसार डॉमर कारोबारी मप्र में ही करीब 2000 करोड़ रूपये तक का कारोबार सालाना करते हैं। क्योंकि सरकारी रिफायनरी की डामर के मुकाबले यह जहां 20 प्रतिशता तक सस्ती होती है। वहीं दूसरी ओर सड़क निर्माण से जुड़े कारोबारियों का मुनाफा बढ़ जाता है। इसके साथ ही
बड़े ट्रेडर से थोक में सौदा कर लोकल डामर ऐजेंट सड़क ठेकेदारों को सरकारी रिफायनरी के फर्जी बिल के साथ डामर मुहैया कराता है।
प्रदेश में लगातार सड़को के निर्माण और सुधार का कार्य चलता रहता है। इस कारण प्रदेश में बड़ी मात्रा में डामर का उपयोग होता है। यदि इनके ठेकेदारों द्वारा लगाये गए डामर खपत बिलों की जांच कराई जाय तो करोड़ों रूपये का जीएसटी घोटाला सामने आ सकता है।
लोक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव सुखबीर सिंह से सम्पर्क हो पाया, उन्होंने फ़ोन रिसीव नहीं किया।आरके मेहरा, सचिव लोक निर्माण विभाग का कहना है अभी कोई शिकायत विभाग को नहीं मिली है। इस तरह के प्रकरणों को रोकने केंद्र सरकार द्वारा जारी परिपत्र विचाराधीन है।
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